बच्चे को रखता स्वस्थ मां का दूध

हर मां बच्चे को हर हालत में स्तनपान ही कराना चाहती है और इस में खास बात यह है कि मां का दूध बच्चे के लिए सर्वोत्तम होता है. तभी बौटल फीडिंग फौर्मूला ईजाद करने वाले वरिष्ठ अमरीकन ओलिवर वैंडल होम्स भी मां के दूध को, ऊपर के दूध से अधिक बेहतर मानते हैं. विज्ञान तकनीक चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाए, लेकिन अभी भी प्रकृति की कुछ चीजें ऐसी हैं, जो सर्वश्रेष्ठ हैं. अमेरिका के द पियन स्टेट चिल्ड्रैंस हौस्पिटल के पैडियाट्रिक्स के वरिष्ठ डा. मार्क विडोम, हैल्थ ऐंड वैल बीइंग औफ बेबीज की कार्यकारी निदेशिका लिजा बर्नस्टीन और स्तनपान और बेबी की अनुसंधानकर्ता शरोन मजेल इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि मां का दूध नवजात की मांग को देख कर ही बनाया गया है. इन के अनुसार मां के दूध में 100 ऐसे पदार्थ पाए जाते हैं, जो गाय या भैंस के दूध में नहीं होते और न ही किसी प्रयोगशाला में बनाए जा सकते हैं.

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मां के दूध में बच्चे की जरूरत के अनुसार अपनेआप ही परिवर्तन होते रहते हैं. जैसे सुबह का दूध दोपहर के दूध से फर्क होता है ताकि बच्चे को दूध पचाने में आसानी हो. ऐसे ही मां के दूध में गाय के दूध के मुकाबले सोडियम कम मात्रा में होता है, जिस से बच्चे के गुरदे सुगमता से कार्य कर सकते हैं.

पाचनक्रिया के अनुकूल

दरअसल, मां का दूध बच्चे की पाचनक्रिया और उस की संवेदनशीलता के अनुकूल होता है. इसीलिए इस में मौजूद प्रोटीन बच्चा सुगमता से पचा लेता है. जबकि गाय के दूध में होने वाला प्रोटीन और फैट जल्दी हजम नहीं होता. स्तनपान करने वाले शिशुओं में गैस कम बनती है और वे उलटी वगैरह से ज्यादा दूध भी नहीं निकालते. मां का दूध बच्चे के लिए सुरक्षित है. यह पहले से तैयार नहीं होता, इसलिए इस में संक्रमण नहीं होता और यह खराब नहीं होता.

पेट को देता आराम

मां का दूध खुद ही पाचन योग्य है, इसलिए जल्दी हजम हो जाता है. बच्चे को कब्ज की शिकायत और डायरिया की आशंका भी नहीं होती. मां का दूध भोजन हजम न करने वाले हानिकारक माइक्रो और्गनिज्म को निष्क्रिय कर शारीरिक वृद्धि वाले तत्त्वों को पैदा करने में सहायक होता है.

रोकता संक्रमण

स्तनपान से शिशुओं को ऐंटीबौडीज की बहुत हैवी डोज मिलती रहती है, जिस से उन के शरीर में प्रतिरोधात्मक शक्ति अधिक होती है. अकसर पाया गया है कि मां का दूध पीने वाले बच्चों को नजला, जुकाम, कान, श्वासनली और मूत्राशय में संक्रमण की शिकायत बहुत कम होती है. यदि कुछ हो भी तो वह बहुत जल्दी ठीक हो जाता है, जबकि बोतल का दूध पीने वाले बच्चे को अकसर ऐसे छोटेमोटे संक्रमण हो जाते हैं. टिटनैस, डिप्थीरिया, पोलियो जैसे रोगों से लड़ने के लिए मां का दूध प्रतिरोधक के रूप में कार्य करता है.

कैलोरी नियंत्रक

कई बार देखा गया है कि मां का दूध पीने वाले बच्चे, बोतल का दूध पीने वाले बच्चों के मुकाबले अधिक स्वस्थ होते हैं पर वजनी नहीं. वे मोटापे का शिकार नहीं होते. मां का दूध बच्चे को संतुष्टि देता है, भूख मिटाता है. यह बात बच्चे के शारीरिक विकास में किशोरावस्था में भी देखी जा सकती है. अनुमान है कि मां का दूध पीने वाले बच्चों में कोलैस्ट्रौल लेवल भी नियंत्रित रहता है.

मां के लिए श्रेयस्कर

माताओं का स्तनपान से गर्भावस्था के दौरान बढ़ा हुआ वजन काफी हद तक कम हो जाता है. गर्भाशय अपने स्थान पर जा पहुंचता है और पोस्टपार्टम डिस्चार्ज कम होता है, यानी रक्त की कमी नहीं रहती. इस के अलावा दूध पिलाने से प्रतिदिन 500 कैलोरीज बर्न हो जाती हैं, यानी मां आराम से 500 कैलोरीज खर्च कर सकती है. स्तनपान स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उत्तम माना गया है. स्तनपान कराने वाली मां को गर्भाशय, ओवरीज और ब्रैस्ट कैंसर की संभावना भी बहुत कम हो जाती है. गठिया जैसे रोग की आशंका भी स्तनपान करवाने वाली महिलाओं में बहुत कम होती है. जबकि वे महिलाएं जो अपना दूध शिशु को नहीं पिलातीं उन्हें अकसर बड़ी उम्र में जा कर इस का शिकार होना पड़ता है.

मां का दूध हमेशा उपलब्ध रहता है. न गरम करने, न बाजार का चक्कर लगाने और न ही बोतल उबालने जैसी झंझट. बोतल में दूध बच जाता है तो उसे गिराना पड़ता है, जबकि मां के दूध के साथ ऐसा कुछ भी नहीं. यह भी माना गया है कि स्तनपान कराने वाली महिलाओं में अवसाद के लक्षण भी बहुत कम पाए जाते हैं.

Source: grihshobha

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