गर्भ में होने वाले बच्चों के विकार

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गर्भ से ही कुछ बच्चों में उन के शरीर के अंगों में विकृतियां आने से ले कर उन की ऐक्टिविटीज और ऊर्जा तक बदलने आदि की समस्याएं शुरू हो जाती हैं. वे बच्चे जब इन स्वास्थ्य समस्याओं के साथ जन्म लेते हैं तो उन्हें हम जन्मदोष कहते हैं. जन्मदोष के 4,000 से अधिक विभिन्न प्रकार हैं. इन में वे भी हैं जिन्हें ठीक करने के लिए किसी तरह के इलाज की जरूरत नहीं पड़ती और दूसरे वे गंभीर बीमारियां भी हैं, जिन के लिए शल्य चिकित्सा की जरूरत पड़ती है, जिस के न होने से बच्चे के अपंगता के शिकार होने की भी संभावना रहती है. एक सर्वे के अनुसार, हर 33 में से 1 बच्चा जन्मदोष के साथ पैदा होता है. उस में भी अगर कोई बच्चा कुरूप हो कर जन्म ले या उस बच्चे के शरीर का कोई अंग गायब हो, तो उसे भी संरचनात्मक जन्मदोष ही कहा जाता है. हार्ट डिफैक्ट भी संरचनात्मक जन्मदोष का एक प्रकार है, तो हड्डियों का विस्थापित होना भी.

जो लोग मातापिता बनना चाहते हैं उन्हें यह जानना जरूरी है कि कुछ जन्मदोषों को होने से रोका जा सकता है. इस के लिए गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त मात्रा में आयोडीन तथा फौलिक ऐसिड का सेवन करना फायदेमंद रहता है. इस से बच्चे को काफी हद तक जन्मदोषों से बचाया जा सकता है.

कारण

जन्मदोष का एक कारण तो वातावरण से संबंधित होता है यानी गर्भ के दौरान बच्चा किन कैमिकल या वायरस के संपर्क में था, तो दूसरा कारण भू्रण के जीन में कोई समस्या होना हो सकता है या हो सकता है कि दोनों ही कारण हों. अगर गर्भावस्था के दौरान महिला को किसी प्रकार का संक्रमण है तो भी बच्चा जन्मदोष के साथ पैदा हो सकता है. अन्य कारण, जिन की वजह से जन्मदोष हो सकते हैं, वे हैं रुबेला और चिकन पौक्स. अच्छी बात यह है कि ज्यादातर लोगों को इन के संक्रमण से बचने के लिए टीके लगा दिए जाते हैं, इसीलिए इस प्रकार के संक्रमण होने के खतरे कम होते हैं. गर्भवती महिला के द्वारा शराब पीने से फीटल अल्कोहल सिंड्रोम की समस्या हो सकती है. इस के अलावा कुछ ऐसी दवाएं भी हैं जिन्हें लेने से बच्चे में जन्मदोष की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ जाती है. डाक्टर ज्यादातर ऐसी दवाएं गर्भावस्था के दौरान देने से बचते हैं. शरीर की हर कोशिका में क्रोमोसोम्स होते हैं, जो जीन से बने होते हैं. ये किसी इंसान की अद्वितीय विशेषताओं का निर्धारण करते हैं. गर्भधारण के दौरान बच्चा मातापिता से 1-1 क्रोमोसोम जीन के साथ ग्रहण करता है. इस प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह की गलती बच्चे में क्रोमोसोम की मात्रा को बढ़ा या घटा सकती है या इस से क्रोमोसोम्स को क्षति भी पहुंच सकती है. डाउन सिंड्रोम एक ऐसा जन्मदोष है जो क्रोमोसोम की समस्या के कारण ही होता है. यह बच्चे में 1 क्रोमोसोम के ज्यादा आने की वजह से होता है. बाकी जैनेटिक डिफैक्ट भी मातापिता के गलत जीन के मौजूद होने के कारण ही होते हैं. इस प्रक्रिया को रिसेसिव इन्हैरिटैंस कहते हैं. जन्मदोष केवल एक व्यक्ति के जीन के कारण भी संभव है जिसे डौमिनैंट इन्हैरिटैंस कहते हैं.

कुछ मेल चाइल्ड्स में केवल उन की मां के जीन से आए विकार शामिल होते हैं. इन की वजह से हेमोफिला, कलर ब्लाइंडनैस आदि की समस्या हो जाती है जिन्हें एक्स-लिंक भी कहते हैं, क्योंकि ऐसे जीन एक्स क्रोमोसोम में ही होते हैं. पुरुषों में केवल एक्स-क्रोमोसोम ही होता है जो उन्हें उन की मां से प्राप्त होता है. दूसरी ओर महिलाओं में 2 क्रोमोसोम होते हैं, जिन में से एक मां से तथा दूसरा पिता से लिया गया होता है. इसीलिए एक्स-क्रोमोसोम के जीन में किसी भी तरह की गड़बड़ी होने से लड़कों पर इस का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है. वहीं लड़कियों के एक जीन में खराबी से होने तथा दूसरे के सही होने से ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है.

जैनेटिक जन्मदोष

सिस्टिक फाइब्रोसिस त्वचा की लाइनिंग में मौजूद कोशिकाओं के साथसाथ फेफड़े की ओर जाने वाले रास्ते को, पाचन तंत्र को यहां तक  कि रिप्रोडक्टिव सिस्टम को भी प्रभावित करती है. इस के कारण शरीर के इन अंगों में कफ की चिपचिपी मोटी परत बन जाती है. जिन बच्चों में सिस्टिक फाइब्रोसिस की समस्या होती है, उन्हें फेफड़े में संक्रमण, पाचनतंत्र में समस्या, कम वजन आदि की शिकायत हमेशा रहती है. फेफड़ों का ध्यान रखना, अच्छा पौष्टिक आहार लेना आदि इस समस्या का इलाज है. डाउन सिंड्रोम एक सामान्य जन्मदोष है, जो हर 800 से 1,000 में से 1 बच्चे को होता है. बच्चों में डाउन सिंड्रोम होने की संभावना मां की बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती जाती है. जिन बच्चों को डाउन सिंड्रोम होता है उन में क्रोमोसोम संख्या 21 की एक कौपी अधिक होती है. दरांती सैल बीमारी लाल रक्त कोशिकाओं से जुड़ी बीमारी है जिस में असाधारण दरांती के आकार की कोशिका क्रौनिक ऐनीमिया को जन्म देती है, जिस से रक्त कोशिकाओं की संख्या घट जाती है तथा अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होती हैं.

सामान्य जन्मदोष

क्लेफ्ट होंठ की समस्या तब होती है जब मुंह या होंठों की कोशिकाएं अच्छे से विकसित नहीं हो पाती हैं. क्लेफ्ट लिप में ऊपर के होंठ और नाक के बीच में लंबा खुलापन होता है. क्लेफ्ट चंसंजम नाक के छेद और मुंह के अंदर के ऊपरी हिस्से के बीच के खुलेपन को कहते हैं. ये समस्याएं जन्म के बाद सर्जरी से ठीक की जा सकती हैं. क्लबफूट शब्द का इस्तेमाल पैरों के स्ट्रक्चरल डिफैक्ट के लिए किया जाता है. जिस में हड्डियां, जौइंट्स, मसल्स तथा रक्त धमनियां गलत तरह से विकसित होती हैं. यह एक सामान्य जन्मदोष है, लेकिन इस समस्या से लड़के, लड़कियों से दुगने प्रभावित होते हैं. ज्यादातर केसेज में कारण की जानकारी नहीं होती है, लेकिन कुछ केसेज में क्लबफूट एक जैनेटिक डिसऔर्डर या मां की बच्चेदानी में समस्या के कारण होता है जिस वजह से बच्चों के पैरों का विकास उतने ढंग से नहीं हो पाता है. जन्मजात हाइपोथाइरोडिज्म जो हर 3,000 से 4,000 में से एक बच्चे में पाया जाता है, तब होता है जब बच्चे में थायराइड ग्लैंड अनुपस्थित हो या जब वह अच्छे से विकसित न हुआ हो. इस बीमारी की वजह से थायराइड हारमोन में कमी आ जाती है, जो किसी भी बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए अत्यधिक जरूरी होता है.

फीटल अल्कोहल सिंड्रोम की वजह से धीमा विकास, बौद्धिक अक्षमता, चेहरे में विकृति तथा नर्वस सिस्टम में समस्या आदि जैसी समस्याएं होती हैं. फीटल सिंड्रोम का कोई इलाज नहीं है, लेकिन गर्भावस्था के दौरान शराब से दूरी रख कर इस समस्या से बचा जा सकता है. न्यूरल ट्यूब डिफैक्ट की समस्या गर्भावस्था के उस महीने में होती है जब गर्भ में पल रहे बच्चे का दिमागी विकास शुरू होता है. इस दौरान बच्चे के दिमाग में स्पाइनल कौर्ड विकसित होना शुरू हो जाता है, जो एक ट्यूब के रूप में तैयार होता है. अगर यह ट्यूब अच्छे से बंद न हो तो न्यूरल ट्यूब डिफैक्ट की शुरुआत होती है. यह समस्या हर 3,000 में से 1 बच्चे को होती है और इस डिफैक्ट के होने पर कुछ बच्चों की जन्म के साथ ही मृत्यु हो जाती है. गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त मात्रा में फौलिक ऐसिड का सेवन बच्चों में न्यूरल ट्यूब डिफैक्ट की समस्या की संभावना को कम कम कर सकता है.

हार्ट डिफैक्ट की शुरुआत तब होती है जब गर्भ में बच्चे के दिल का विकास नहीं हो पाता. जतपंस डिफैक्ट व एअर वैंट्रिकुलर डिफैक्ट हार्ट डिफैक्ट के अंतर्गत ही आते हैं, जो दिल के दाएं तथा बाएं हिस्से को अलग करते हैं. हार्ट डिफैक्ट की शुरुआत तब होती है जब ट्यूब के आकार की धमनियों में बहने वाला खून गर्भावस्था के दौरान लिए जाने वाली दवाओं जैसे केपोथेरैपी ड्रग्स, थालिडोमाइड, दजोपेमप्रनतम ड्रग आदि के संपर्क में आता है. गर्भावस्था की शुरुआत के 3 महीने हार्ट डिफैक्ट के लिए बहुत संभावित होते हैं. इस के अलावा शराब का सेवन, रुबेला इन्फैक्शन, डायबिटीज आदि से भी बच्चों में हार्ट डिफैक्ट होने की संभावना बढ़ जाती है.

बच्चों में व्यवहार विकार

छोटे बच्चे नादान हो सकते हैं, बात न मानने वाले हो सकते हैं और समयसमय पर गुस्से में आ सकते हैं. ये सब साधारण बातें हैं, लेकिन कुछ बच्चों में ये बातें बहुत कठिन स्तर तक होती हैं. सब से हानिकारक व्यवहार विकारों में से एक है औपोजिटियोनाल डिफायंट डिसऔर्डर, तो दूसरा बरताव विकार और तीसरा अटैंशन डेफिसिट हाइपरऐक्टिविटी डिसऔर्डर. इन तीनों व्यावहारिक विकारों के समान लक्षण होते हैं, इसलिए इन का पता लगा पाना बहुत ही मुश्किल होने के साथसाथ बहुत ज्यादा समय भी लेता है.

औपोजिटियोनाल डिफायंट डिसऔर्डर

12 साल से कम का करीब हर 10 में से 1 बच्चा इस से ग्रस्त होता है और लड़कों में यह समस्या होने की संभावना लड़कियों से लगभग दोगुनी होती है. इस से ग्रस्त किसी बच्चे के ये लक्षण हो सकते हैं:

जल्दी गुस्सा होना.

जल्दी आपा खो देना.

बहस करना खासकर अपने मांबाप से.

नियमों को न मानना.

दूसरों को चिढ़ाना.

जल्दी चिढ़ जाना.

अपनी गलतियों के लिए दूसरों को दोष देना.

बरताव विकार

जिन बच्चों में बरताव विकार पाया जाता है अकसर उन्हें बुराभला कहा जाता है, क्योंकि वे बड़े जिद्दी होते हैं और नियमों को नहीं मानते. 10 साल तक के करीब 5% बच्चों में यह विकार होता है, लेकिन लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में यह ज्यादा होता है. इस विकार से जुड़ी कुछ महत्त्वपूर्ण बातें ये हैं: कठिनाई भरी गर्भावस्था, समय से पहले जन्म, जन्म के समय कम वजन होना आदि कुछ ऐसे कारण हैं, जो आगे जा कर बच्चों में बरताव विकार लाते हैं. जिन बच्चों को बचपन से ही संभालना मुश्किल होता है जो बात नहीं मानते और हमेशा उग्र रहते हैं, उन में बरताव विकार के होने की संभावना बहुत ज्यादा होती है. यह बरताव पारिवारिक बरताव तथा वातावरण पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है. जिन बच्चों को पढ़नेलिखने और समझने में समस्या आती है उन में इन विकारों के होने की संभावना ज्यादा होती है. कई अध्ययनों से पता चला है कि दिमाग का वह हिस्सा जहां ध्यान लगाने की शक्ति होती है वह ऐसे बच्चों में कम हता है.

लक्षण

मातापिता की बात न मानना.

ड्रग्स, सिगरेट, शराब आदि का सेवन करना.

दूसरों के लिए भावनाएं न होना.

बारबार झूठ बोलना.

लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना.

लड़ते समय हथियार तक का इस्तेमाल करना.

चोरी करना, जानबूझ कर आग लगाना, किसी चीज को तोड़ देना, दूसरों के घर में बिना पूछे घुस जाना.

घर से भाग जाने की प्रवृत्ति.

आत्महत्या करने की कोशिश करना.

अटैंशन डेफिसिट हाइपरऐक्टिविटी डिसऔर्डर: करीब 5% बच्चों में यह समस्या पाई जाती है और लड़कों में लड़कियों की अपेक्षा यह समस्या ज्यादा होती है.

लक्षण

किसी एक काम में ध्यान लगा पाने में असमर्थ होना.

दूसरों से ऊंची आवाज में बात करना.

बातचीत के दौरान ओवर रिऐक्ट करना.

समस्याओं के लिए इन लोगों से संपर्क करें:

अपने फैमिली डाक्टर से.

पैडियाट्रिशयन यानी बाल रोग विशेषज्ञ से.

बाल मनोवैज्ञानिक से.

Source: grihshobha

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