3 मई गुरुवार 3 maī guruvār गणेश चौथ सारे gaṇesh chauth sāre संकट होंगे दूर saṅkaṭ hoṅge dūr, बंद पड़ा काम भी baṅd paḍā kām bhī हो जायेगा शुरू ho jāyegā shurū – बस करे ये bas kare ye छोटा सा काम chhoṭā sā kām

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गणेश चौथ एक महत्वपूर्ण हिन्दू पर्व है जिसमे विवाहित महिलाएं उपवास रखती है। इस उपवास को माघ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन किया जाता है। इसे ‘तिल चौथ’ या ‘माहि चौथ’ भी कहा जाता है। सकट का अर्थ होता है अपभ्रंश। माना जाता है इस दिन श्री गणेश ने देवताओं की मदद कर उनके संकट को दूर किया था। जिसके बाद भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया था की आज से दिन को लोग संकट मोचन के रूप में मनाएं। जो भी व्यक्ति इस दिन व्रत करेगा, उसके सभी संकट इस व्रत के प्रभाव से दूर हो जाएंगे। ‘वक्रतुण्डी चतुर्थी’, ‘माही चौथ’ और ‘तिलकुटा चौथ’ भी इसी पर्व के अन्य नाम है।

इस दिन विद्या बुद्धि, संकट हरण श्री गणेश तथा चंद्र देव का पूजन किया जाता है। यह व्रत संकटों को दूर करने और दुखों को दूर करने वाला होता है। यह उपवास रखने से व्रती की सभी इच्छाएं सम्पूर्ण हो जाती है।

महत्व :
गणेश चौथ का उपवास श्री गणेश के पूजन और उनके ध्यान के लिए किया जाता है। इस दिन उनके पूजन का विशेष महत्व होता है। इस पर्व को उत्तर भारत में बड़े विशवास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। ये व्रत माताएं अपने पुत्रों के जीवन और उनकी खुशियों के लिए रखती है।

सकट माता मंदिर :
राजस्थान में एक गाँव है जिसे सकट गाँव कहा जाता है यहाँ देव सकट का एक प्राचीन मंदिर है। यहाँ मौजूद मूर्ति संकट चौथ माता की है। यह मंदिर अलवर से 60 किमी है जबकि जयपुर से 150 किमी है। इस मंदिर में जाकर आप देवी सकट के बारे में सभी जानकारियां ले सकते है।

चतुर्थी के दिन मूली नहीं खानी चाहिए, धन हानि की आशंका होती है। देर शाम चंद्रोदय के समय व्रत करने वाले को तिल, गुड़ आदि का अघ्र्य चंद्रमा, गणेश जी और चतुर्थी माता को अवश्य देना चाहिए। अघ्र्य देकर ही व्रत खोला जाता है। इस दिन स्त्रियां निर्जल व्रत करती हैं। सूर्यास्त से पहले गणोश संकष्ट चतुर्थी व्रत कथा-पूजा होती है। इस दिन तिल का प्रसाद खाना चाहिए। दूर्वा, शमी, बेलपत्र और गुड़ में बने तिल के लड्डू चढ़ाने चाहिए।

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कथा के अनुसार, सतयुग में महाराज हरिश्चंद्र के नगर में एक कुम्हार रहता था। एक बार उसने बर्तन बनाकर आंवा लगाया पर आंवा पका ही नहीं, बर्तन कच्चे रह गए। बार-बार नुकसान होते देख उसने एक तांत्रिक से पूछा तो उसने कहा कि बच्चे की बलि से ही तुम्हारा काम बनेगा। तब उसने तपस्वी ऋषि शर्मा की मृत्यु से बेसहारा हुए उनके पुत्र को पकड़ कर सकट चौथ के दिन आंवा में डाल दिया। लेकिन बालक की माता ने उस दिन गणोश जी की पूजा की थी। बहुत तलाशने पर जब पुत्र नहीं मिला तो गणोश जी से प्रार्थना की। सबेरे कुम्हार ने देखा कि आंवा पक गया, लेकिन बालक जीवित और सुरक्षित था। डर कर उसने राजा के सामने अपना पाप स्वीकार किया। राजा ने बालक की माता से इस चमत्कार का रहस्य पूछा तो उसने गणोश पूजा के विषय में बताया। तब राजा ने सकट चौथ की महिमा स्वीकार की तथा पूरे नगर में गणोश पूजा करने का आदेश दिया। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकट हारिणी माना जाता है।

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